Category Archives: कुछ पन्ने अतीत से

चेहरे

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जाने पहचाने चेहरे

उत्साह तरंगित करते चेहरे

 

गमो के साये से परेशान

कु छ भोले भाले चेहरे

मर्म को ना समझ पाते चेहरे

हाँ, यह जाने पहचाने चेहरे

 

ह्रदय की अभिलाषाओं  का प्रतीक

उत्साह की तरंगे उमडती होती प्रतीत

आशा के मोहजाल को दर्शाते चेहरे

सच यह जाने पहचाने चेहरे

 

विविध भावों का संगम

जिंदगी का तरनुम

बस एक गीत एक लय से थिरकते चेहरे

कुछ जाने पहचाने चेहरे

 

जो समझे ह्रदय की मूक भाषा को

जो दे  दे नाम इसकी परिभाषा को

वही हैं सही मायने मैं साथी चेहरे

कितने प्यारे जाने पहचाने चेहरे

 

प्रणय  प्यार स्नेह दर्शाते

आँखों के पैमाने से कुछ कह जाते

सच तो यह हैं मयखाने चेहरे

सुन्दर जाने पहचाने चेहरे

 

उजड़ने व् बसने का

प्राचीन इतिहास छुपाये

वक्त  के साथ नित नयी मूरत बनाए

इतिहास के पन्नों से उज्जवल यह चेहरे

स्वर्णिम आभा से धुले

यह जाने पहचाने चेहरे

 

सजल शुब्ध , अंगारे सी लगती हैं

इनमे एक ज्वाला भी जलती हैं

कभी शोला तो कभी शबनम

आंसुओं के मिलन का संगम

निस दिन नए राग गाते

जाने पहचाने चेहरे

 

समय के साथ बदलते

बचपन से बुढापे तक चलते

यह पावन व् निर्मल चेहरे

अंत मैं मृत्यु की गोद  मैं सो जाते

चिर निद्रा मैं मग्न जाने पहचाने चेहरे

 

कर ही रही हूँ जब  चेहरों की बात

तब क्यों कर ना बता दू मैं यथार्थ

हाँ! हैं कुछ चेहरे

ऊपर से लगाए हैं स्नेह के दिखावटी चेहरे

 

खेलते हैं ऐंसा मनभावों से, प्यार से

पर सच तो हैं,

ना देखी इतनी अमानवीयता

न देखी इतनी क्रूरता

हँसते रहंगे घिनोने चेहरे

 

उत्साह क्षीण करते चेहरे

जाने पहचाने चेहरे

लघुता

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नदी किनारे गीली रेत पर पड़ा

वोह नन्हा सा कदम्

कितना आनंदित कर जाता हैं

 

ओ़स की छोटी सी बूँद से

रेशम सा कोमल पता

कितना उल्लसित हो जाता हैं

 

दोनों ही लघु रूप मैं

दोनों ही अबोधता मैं

यही लघु रूप

खोजती हूँ सब मैं

चाहे वोह इंसान हो या अश्रु

वेदना

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रोजमरा की जिंदगी मैं हम सदैव उसको देखते हैं जिसको दुख मिला, पर कई बार ऐसा भी होता हैं, जिसने दुख दिया, उसको भी दुःख होता हैं, और हम उसकी पीड़ा को अनदेखा कर जाते हैं.

उस आँख से टपका वोह अश्रु

जाने कितनी आंह मैं डूबा

पर दुःख क्या केवल उस तक सीमित था

क्या न था कही, कोई और भी गर्त मैं डूबा

 

क्या वोह पावनता, वोह माधुर्य, सिर्फ एक का था?

वेदना का सागर मात्र एक को छूता था?

जिसको आह लगी, जो बुरा बना

उसके मनोभावो से हर कोई अछूता था

 

दूसरा प्रताड़ित हुआ, तो यह भी

पराकाष्ठाओं का बंदी बना था

मानवीय रिश्ता ही हैं, लेना और देना

सागर किसी को व्यथित कर जाता

 

तो खुद भी कितनी व्यथा समेटे था

यूँ जो व्यथित हुआ, वोह तो अश्रु टपका

आंह भर, फिर आशा के महलों मैं सोया

पर दूसरा तो सिर्फ लांछित हो पाया

 

मौन सिसकियाँ उसकी कौन सुन पाया

माना उसने पीड़ा दी

पर वोह भी व्यथित हुआ

महल नहीं, उसने तो

 

आशा का अतिरंजित खंडहर ही पाया

आहत कर, खुद भी आहत हो

वोह न खुश हो पाया, न रो पाया

कैसी विडम्बना हैं दीये की

दुसरे को जलाता, पर

खुद भी जलकर ही रौशनी दे पाया

 

मुस्कान

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जीवन का वो अमूल्य अहसास

वो धडकनों का स्पंदन

जो बेनाम हैं, अपरिभाषित हैं,

फिर भी एक अटूट बंधन

कुछ और नहीं, हैं मंदमुस्कान

 

सूर्य की रश्मियों का आगमन सूचक हैं

शुभ शुरुआत का

यू ही मुस्कानों का आगमान

जीवन मैं आई बसंत बहार का

जो दे जाती हैं  आँखों मैं चमक

चेहरे  पे सूर्य सी आभा

एक माधुर्य, खुशी के अहसास का

मूक सवाली

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उन बच्चों के नाम जो दाने दाने के लिए तरसते हैं……..जब मैं खुद बचपने मैं रहती थी…..

 

सूना सा आँगन , सुखी सी धरती

यह बंजर मरुभूमि, काहे न सरसती

वो ठंडा चूल्हा , वो बेरौनक सी चिमनी

न सुलगती लकड़ी, न धधकती अग्नि

क्यों हैं यह सब ??, शायद हम सभी मूक सवाली हैं

भूखे  हैं अनगिनत  मुंह , हाथ भी खाली हैं

 

क्यों ये जर्जर शरीर , क्यों हैं मौत भी पराई

परछाई सी दिखती , पर हाथ न आयी

कंकाल सी जिन्दा लाशे हैं, पर लोगो के लिए तमाशे हैं

क्यों हैं यह सब ??, शायद हम सभी मूक सवाली हैं

भूखे  हैं अनगिनत  मुंह , हाथ भी खाली हैं

 

हाथ फैलाए वो फटेहाल खड़े हैं

सावन मैं भी , पीले पतों से झडे हैं

दया के पात्र , वो लाचारी मैं पाले हैं

भूखे वो बच्चे, ठणडे चूल्हे से जले हैं

क्यों हैं यह सब ??, शायद हम सभी मूक सवाली हैं

भूखे  हैं अनगिनत  मुंह , हाथ भी खाली हैं

 

 

पल

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कुछ पल, कल के साथ हैं मेरे

कुछ पल, हर पल रहे हैं मेरे

मैं जब बैठी, तुम से कुछ कहने

याद आते हैं वोह पल,

जो नहीं थे मेरे

 

ह्रदय के स्पंदन, आंखों के अश्रु

व्याकुल हैं, कुछ पल गढ़ जाने को

यादो की ठिठकती गलियों मैं

बिखरे पल, खंडहर बन जाने को

मैं जब बैठी तुम से कुछ कहने

याद आते हैं वोह पल,जो नहीं थे मेरे

 

उस पल की झिझकती भाषा,

वोह पल मानो पहचान गया

मौन मैं मौन मिला,

और हर पल जैसे ठहर गया

वोह बंद अधर, नहीं खुले उस पल

जब वोह मितभाषी साथ था मेरे

याद आते हैं वोह पल,जो नहीं थे मेरे

 

इस मैं और पल की दूरी मैं

कितने पल हैं बदल गए

वोह कहते हैं तुम हो बदले

हम कहते हैं, तुम ही बदल गए

पल पल बदलते, वोह पल,

क्यों रहे न मेरे

याद आते हैं वोह पल,जो नहीं थे मेरे

 

नदी की गीली रेत पर, कदमो की छाप मैं

अंकित हैं वोह पल, जब वोह साथ चले थे मेरे

इस पल भी हैं, वोह मूक अधर,

कुछ कहती आंखें, साथ मैं मेरे

कहने को तो साथी हैं हर एक पल के

फिर क्यों याद आते हैं, वोह पल जो नहीं हैं मेरे

 

कुछ पल, कल के साथ हैं मेरे

कुछ पल, हर पल रहे हैं मेरे

मैं जब बैठी, तुम से कुछ कहने

याद आते हैं वोह पल,जो नहीं थे मेरे