Category Archives: चंद कविताएँ हिंदी मैं

घर याद आता हैं

Standard

पहली बारिश की सौंधी महक मैं

सरदी की गुलाबी दौपहर मैं

गर्मी की उस तेज उमस मैं

और फागुन के सुन्हेरी स्नेह मैं

घर याद आता हैं, बहुत याद आता हैं

 

बाबा के हलके से कांपते हाथो मैं

माँ की धीरे होती काम की रफ़्तार मैं

भाई की कम होती शरारतो मैं

घर की पुरानी होती दीवारों मैं

घर याद आता हैं, बहुत याद आता हैं

 

अपने बालो की हलकी से सफेदी मैं

अपने बच्चो की बढ़ती उम्र मैं

यादो की गलियों मैं

बनती मिटती, धुन्द्लाती तस्वीरों मैं

घर याद आता हैं, बहुत याद आता हैं

 

बॉलीवुड की फिल्मो मैं,

त्योहारों की लड़ियों मैं

पुराने संभाले खतो मैं, खानों की महक मैं

देश की रोज बदलती, सुनी अनसुनी खबरों मैं

घर याद आता हैं, बहुत याद आता हैं

 

बहुत दूर  हूँ बैठी घर से

अपना नया घर बनाये

एक आंगन पीछे छोड़

एक नया आशियाना बनाये

घर याद आता हैं, बहुत याद आता हैं

 

उस मट्टी, उस हवा,

उस अहसास से मीलो दूर

फिर भी वही अपने अंदर दबाये

नए देश मैं, पुराने रंग ढूँदती

घर याद आता हैं, बहुत याता हैं

 

कैसा हैं असमंजस,

कैसी हैं यह, विडंबना

रोज जीती हूँ, एक नयी मूरत बनाये

रोज मिटी भी जाती हूँ, याद का दीपक जलाए

घर याद आता हैं, बहुत याद आता हैं

 

 

 

 

 

 

 

Story of my shoe collection 

Standard

It is  known fact among my friends and family, that I love shoes. I have a big collection of them, though its a different story, I like to wear only a few of them on a daily basis. I am often asked, why do I own so many shoes? why do I love to buy shoes at the drop of a hat.

 

Now when I think about this love of my life, believe me it looks like that to some people, I go back to the days when we were growing up, we had two pairs for school, one BATA chappal and if “mahine ka akhir”  allowed a fancy pair to go out. Only different thing we could do in high school with our shoes was to wear “GOLA” shoes instead of plain and simple “Mary Jane”  kind or to find different way of tying shoelaces in PE ones. I know many would identify with me and don’t read “OLD”, I am still from the era of QSQT and Chandni (thinking more shoe…now with chandni look).

 

Two incidences that stand out in my memory. My  mom had a “London returned” cousin, and she had these fancy leather boots all embroidered and “oh” so good looking. She promised to give me those once she outgrew them, only hindrance was she was quite a few years older then me. With time I resigned myself to the fate of not owning them, but they came in my dream so often.

 

And decade later, while raiding my granma’s house, I found these “Dream Shoes” in the attic. With much aplomb they were cleaned and were tried on, “hear drum roll in the background”, but to my dismay they had grown mold inside them and with broken heart were shown the garbage can. “OH” what a sad day, I can still feel the pain of loosing my dream shoes. I own a lot of boots now but nothing come close to owning the damaged, forbidden ones.

 

Now lets move on to the story of” The white belly shoes”. Belly shoes are very common in India, closed flats and very versatile. I had a white pair and I so wanted a black one to match my outfit. I was going with my friend and her brother to fill in college application forms and I decided to treat myself to new shoes. Yes!! long before term  “DIY” got commonly used. I actually did Jugad, took some black polish and made by white shoe turn into “DIY” new black ones.

 

Proudly I stepped out, feeling so proud of my matching outfit and shoes. But the day didn’t last on the same note. By afternoon the white started peeping out, saying hello to the world. By the time I reached back home, it was out in the open, and like Cinderella, I had lost my glass slipper for then, till my handsome prince found me a new one (prince part to be true to the princess story 🙂 ).

 

The life moved on with ups and downs. My actual Prince Charming came, and my parents made sure to send me off with a nice collection of sarees, suits and of course shoes. And by the time my parents visited me in my new home abroad, my collection had grown substantially. One of the few things I did to prepare for their visit, was to put almost all in trash bags, and hide them in the closet. In case you are wondering why, I was embarrassed to own so many, as I had seen my parents working hard to provide us with necessities and luxuries.

 

Going back to the story, picture the moment my parents enter the home, and first thing my then five year old says, “Nani, dekho mama ne kya chuppaya”, it actually felt like that ad, “jab main chota bacha tha” Unbelievable, but they say na “bache man ke sache”

 

Well, there are many more incidents, that  I can share which mark my love of these glossy or matt, solid  or rainbow colored piece of leather or canvas. And not to forget my closest friends have contributed to the varied variety.

 

The  best thing about shoes is that my size has stayed the same  over a long period of time. But just to make clear, my shoe size has remained the same. It’s as loyal to me as my love for them.

 

 

 

 

 

 

बंद मुठी

Standard

आके धीरे से मेरे अक्स ने पूछा

तेरी मुठी मैं ऐसा क्या हैं

क्यों यह बंद, तेरे सीने से लगी 

की सांस रहे या रूक जाए,

यह तेरी मुठी बंद ही रहे

बता न पगली, क्या राज़ हैं छुपा

 

मैं मुस्काई, आँखों मैं हलकी नमी सी आई

बोली यह बंद मुठी हैं मेरे जीवन का सार

छुपा हैं टेडी मेडी, उंच नीची रहो का भार

आजा बता दूं तुझे, छेड़ दूं सरगम के तार

खोल देती हूँ यह मुठी, सिर्फ एक बार

 

सबसे पहले हैं इसमें सुगंध माँ के प्यार की

पारिजात के फूलो जैसी महक उनकी ऐसी

माँ की मैं लाडली, छाया  हु मैं उसकी

हैं बंद इसमें बाबा के हाथो का दुलार

झोली भर भर के हैं आशीष इस मुठी मैं

उनके, जो रहे मार्गदर्शक मेरे बारम्बार

 

इस मुठी मैं हैं, बचपन की यादें, भाई का साथ,

वोह शरारते, वोह नटखट पल,

मौसी, मामा, बुआ, चाचा, कितने ही रिश्ते

किस्से कहानियों और दोस्तों का साथ,

 

इसमें हैं ताना बना, धागों का

जो हैं वजूद मेरा, अस्तित्व मेरा

बुनती हूँ, जिसमे हर दिन हर पल

नयी पुराने , किस्सों का कहा

 

यह बंद मुठी हैं मेरी, मेरे गाव, मेरे शहर,

मेरे देश से मेरी पहचान, एक अटूट गाँठ

जो हर बार, उन गलियों मैं मुझे ले जाती हैं

आशना करा देती हैं, जब भी होता हैं दिल उदास

यह संभाल कर, संजो कर रखी हैं जीवन की आंस

यह बंद मुठी हैं मेरे अक्स, तेरा ही परिचय

जिसके बिना मैं अधूरी, और तू बेनाम

हसरतें

Standard

DSC03602दिल के किसी कौने मैं
हसरतें करवट बदलती है
नयी उमंगें उमड़ती है
कुछ पुरानी लौ लगती है
सपनों को पंख, और
उम्मीदों को उम्र चढ़ती है
रंगीन चाहतो के ताने बाने मैं
ज़िंदगी गुज़रती है

 

 

 

विडम्बना फिर भी वही
जहाँ अiरजूऔ का मेला है
वहाँ हर पल, तनहा अकेला है
साँझ की चौखट पर
नये सूरज को तकता है
शायद कोई नयी सुबह हौ
बस दिल के किसी कौने मैं
एक बार नहीं हर बार
नयी लहरें हिलौरे लेती है
नयी उमंगें उमड़ती है………..

राहतें

Standard

IMG_3273ख़ामोशियों की ज़ुबान,
बेशक कुछ नहीं होती।
फिर भी कह जाती है,
वोह जिसकी इनतेहा नहीं होती।
राहतें मिलती है, ऐ दिल,
अॉखौ की ज़ुबानी।
वैसे तो, ख़ामोश रातों, सूने पलो की,
कहानी कभी पूरी नही होती।

Bahut……बहुत

Standard

img_0039-2.jpg

कहने को, बयाँ करने को, हसीं पल हैं बहुत

लिखने को, गढ़ने को, कोहिनूर हैं बहुत

चाहने को, आरज़ूओं का मेला हैं बहुत

तमना करे जिनकी, ऐसी चाहते हैं बहुत

पाया हैं ज़िन्दगी मैं प्यार हमने बहुत

इसिलए शुक्रिया  अता करने को, दुआ देने को हैं बहुत

दुःख की लहरें जब भी उठी , खुशियों का साया बहुत

हंसी की नूरानी जब फीकी पड़ी, चंदा की चांदनी बहुत

पतझड़ के पीले पतों पर, सावन की बौछार बहुत

जब भी दामन खाली हुआ, दोस्तों का नज़राना बहुत

पाया हैं ज़िन्दगी मैं प्यार हमने बहुत

इसिलए शुक्रिया  अता करने को, दुआ देने को हैं बहुत

 

बारिश

Standard

Baarishजहा तुम  बारिश वहा

जहा तुम नही बारिश वहा

फर्क फ़कत इतना

एक नमी मैं उम्मीद

एक नमी मैं उदासी

जहा तुम जज़्बात वहा

जहा तुम नहीं जज़्बात वहा

फर्क फ़कत इतना

कुछ मैं ख़ुशी

कुछ मैं बारिश का पानी

जहा  तुम पदचिन्ह वहा

जहा तुम नहीं पदचिन्ह वहा

फर्क फ़कत इतना

एक तरफ सागर का किनारा

दूजी और गीली रेत बिखरी वहा

जहा तुम  इमारते वहा

जहा तुम नहीं  इमारते वहा

फर्क फ़कत इतना

एक तरफ क्षितिज

दूसरी और   टूटे खंडहर वहा

जहा तुम बारिश वहा

जहा तुम नहीं बारिश वहा

नव वर्ष

Standard

पदचिंह....Footprints of Past and Future

नए रंग, नए रूप,

नए पल, नयी खुशियाँ

नए लोग, नए रिश्ते

नए दिन और नयी दुनिया

नए वर्ष की ड्योढ़ी पर

पुराना साल भी छोड़े जाता

कुछ अपूर्ण स्वप्न, आधी अभिलाषा

पूरी हो हर कामना, हर सपना

शुभ हो, मंगल हो, प्रार्थना है

पास हो हर अपना

View original post