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एक पुरानी कविता नव वर्ष के नाम

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चंहु और उजाला, चंहु और ख़ुशी

मुस्कानों की फुलवारी चंहु और खिली

कही उदासी, कही कोई दुखी

कही कोई अकेला कही कोई सुखी

 

ऐसे ही धुप छाँव मैं,

बीत गया यह वर्ष

गर्म सर्द की चादर ओड़े

गुजर गया यह वक़्त

 

करे प्रार्थना सुखमय हो,

पावन हो नव वर्ष

हर जन की झोली मैं आये दिवाली,

चंहु और फैले यश एवं हर्ष

 

कह पाए एक सुर हो

चंहु और उजाला, चंहु और ख़ुशी

मुस्कानों की फुलवारी चंहु और खिली

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नव वर्ष

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नए रंग, नए रूप,

नए पल, नयी खुशियाँ

नए लोग, नए रिश्ते

नए दिन और नयी दुनिया

नए वर्ष की ड्योढ़ी पर

पुराना साल भी छोड़े जाता

कुछ अपूर्ण स्वप्न, आधी अभिलाषा

पूरी हो हर कामना, हर सपना

शुभ हो, मंगल हो, प्रार्थना है

पास हो हर अपना

तेरी क्या बात कहे

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तेरी क्या बात कहे,

तुझे क्या ना कहे

तू सच हैं मेरा

आगाज़ भी तू, अंजाम भी तू

जीने का अंदाज़ हैं मेरा

 

बिखर जाती हैं हंसी मेरे होठों पर

तेरी आँखों से टपकतीं हंसी को देख

उन आँखों की क्या बात कहे

मुस्कुराती, गुगुदाती, शरारतो से टिमटिमाती

कुछ कही अनकही कह जाती

तेरी क्या बात कहे

 

सीने मैं लहर सी उठती हैं

जो तेरे लब हिले

कुछ धीरे से हँसे

उस हंसी की क्या बात कहे

मधम सी, कायनात को रोशन करती

मुझे अपने आगोश मैं लेती

तेरी क्या बात कहे

 

तू हैं ऐसा हसीं

तेरी नीयत, मेरा यकीन

तू हैं मेरा किनारा

मैं तेरी, सिर्फ तेरी

तेरी क्या बात कहे

इक नज़र

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इक नज़र प्यार की

इक नज़र इकरार की

इक नज़र में जी गयी

मैं ना जाने कितने जनम

इक नज़र तेरे साथ की

मैं हो गयी तेरी सनम…..

 

इक नज़र उस चाँद की

इक नज़र उस खवाब की

आके मेरे दामन में

जो कर गए पूरा मुझे

दे गए हज़ार नैमते

दिल के यह दो टुकड़े मेरे….

 

इक नज़र ने दे दिए ना जाने कितने ही पल

एक नज़र के वास्ते चल दिए कितने कदम

इक नज़र में जी गए जाने कितने जनम

एक नज़र प्यार की…….